भूला हुआ खत

फरवरी की ठंडी शाम थी जब आर्यन गुरुग्राम की एक पुरानी एंटीक बुकस्टोर में दाखिल हुआ। दुकान में बसी हुई पुरानी किताबों की खुशबू और एक अजीब सा सन्नाटा उसे किसी और ही दुनिया में ले जा रहा था। वह यूँ ही वक़्त बिताने आया था—वैलेंटाइन डे की तन्हाई से बचने के लिए।

खत

किताबों की कतारों के बीच उसकी नज़र एक चमड़े की जिल्द वाली पुरानी डायरी पर पड़ी। डायरी पर कोई नाम नहीं था, बस एक रहस्यमयी आकर्षण जिसने उसे अपनी ओर खींच लिया। उसने डायरी खोली और देखा कि अंदर कुछ हाथ से लिखे हुए ख़त थे—किसी भूली-बिसरी प्रेम कहानी के निशान।

वह एक कोने में बैठा और पढ़ने लगा।

“मेरी प्रिय आइशा,”

पहला ख़त एक गहरे प्रेम की गवाही देता था। पत्रों में वीर नाम के एक युवक और आइशा नाम की युवती के प्यार की कहानी लिखी थी। उनकी मोहब्बत में एक मासूमियत और जुनून था, लेकिन जैसे-जैसे आर्यन आगे बढ़ा, एक अजीब बेचैनी उसे घेरने लगी।

कुछ ख़तों के बाद भावनाओं में बदलाव आ गया था।

“आइशा, मैंने तुम्हें आज फिर घड़ी वाले टावर के पास देखा। तुम अलग लग रही थी, जैसे मुझे पहचानती ही नहीं। मैंने तुम्हें पुकारा, लेकिन तुम बिना देखे चली गई। क्या तुम मुझे भूल गई हो?”

आर्यन का माथा सिकुड़ गया। अगली चिट्ठियों में वीर की उलझन और तड़प साफ़ झलक रही थी। ऐसा लग रहा था कि कभी जो प्रेम अमर था, वह अब एकतरफा याद बनकर रह गया है।

फिर आया आखिरी ख़त।

“आइशा, लोग कहते हैं कि तुम मुझे कभी जानती ही नहीं थी। कि हमने कभी साथ वक़्त नहीं बिताया। लेकिन मैं कैसे मान लूँ? मुझे तुम्हारी हँसी याद है, वो बारिश में भीगना याद है, वो हर लम्हा याद है। मैं तुम्हें फिर से ढूँढ निकालूँगा… किसी भी हाल में।”

आगे पन्ने ख़ाली थे।

आर्यन ठगा-सा बैठा रहा। क्या वीर पागल हो गया था? या फिर सच में कोई रहस्य इस प्रेम कहानी में छिपा था?

तभी किताबों की गंध के साथ बूढ़े दुकानदार की आवाज़ आई, “तुमने वो डायरी ढूंढ ली?”

आर्यन ने सिर उठाया, “क्या आप जानते हैं इस वीर और आइशा के बारे में?”

बूढ़े व्यक्ति की आँखों में एक उदासी उभर आई। “यह कहानी दशकों पुरानी है। वीर नाम का एक युवक पागलों की तरह आइशा से प्यार करता था। लेकिन एक दिन आइशा ने उसे पहचानना ही बंद कर दिया। जैसे उनकी सारी यादें मिटा दी गई हों।”

“ऐसा कैसे हो सकता है?” आर्यन ने चौंककर पूछा।

“कोई कहता है, किसी ने उन पर श्राप दे दिया था। कोई कहता है, आइशा कभी असल में थी ही नहीं।”

आर्यन का दिल धक से रह गया। उसने डायरी अपने बैग में रखी और बाहर निकल आया।

जैसे ही वह घड़ी वाले टावर के पास पहुँचा, उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी। वह हवा में उड़ते बालों के साथ टावर को देख रही थी। उसकी शक्ल… वही थी जो उसने वीर की चिट्ठियों में पढ़ी थी।

आर्यन का गला सूख गया।

“आइशा?” उसने धीरे से कहा।

लड़की ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखें मिलीं। एक पल को ऐसा लगा जैसे वो उसे पहचान रही हो। फिर उसकी आँखों में खालीपन उतर आया और वह चुपचाप आगे बढ़ गई।

आर्यन वहीं खड़ा रह गया, डायरी को कसकर थामे हुए।

उसे समझ आ गया था—कुछ प्रेम कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं। वो बस समय के कोहरे में कहीं छिप जाती हैं, फिर से याद किए जाने के इंतज़ार में।